The art of letting go
तुम मुझे तब मिली जब मेरे जीवन में बहुत कम चीजें बची थी। ऐसे समय पर अक्सर लगता है कि हम किसी से नहीं मिलेंगे। लेकिन तुमने मेरे मन में आए हर एक बुरे खयाल को मुझसे दूर करते हुए बताया कि किसी का परवाह करना कितना खूबसूरत हो सकता है। मुझे याद है जब तुम और मैं बात करते थे उस समय मेरे पहले crush के मेरे से बात न करने पर मैं कितना उदास रहा करता था। तुमने मेरी सारी उदासी धीरे धीरे समेट ली और मुझे इस बात की खबर तक न हुई। मुझे लगा मैं हमेशा से ऐसा ही हूँ। तुम मेरे दिन की सबसे बड़ी जश्न हुआ करती थी। तुम्हारे साथ रहना शायद मेरी सबसे बड़ी खुशनसीबी थी। उस आखिरी दिन जब हम दोनों ने बात की थी।
"तुम मेरे मरने के बाद क्या करोगे?"
"ऐसे पागलों जैसे बातें क्यों कर रही हो तुम?"
"अरे! बोलो ना। सोचो मैं कल मर जाऊँ तो फिर?"
"ऐसा कुछ नहीं होगा।"
"प्रफुल्ल, होने को तो कुछ भी हो सकता है न? चलो ठीक है मानो जब मैं बूढ़ी हुई तब मरी ठीक? अब बोलो तुम क्या करोगे?"
"मुझे नहीं पता।"
"चलो मुझे उत्तर मिल गया।"
"कैसे भला?"
"कम से कम तुम इतना तो मानते हो कि मरते वक्त तक तुम मेरे साथ रहोगे। मुझे तो बस वही जानना था।"
"तुम भी क्या बातें करती हो न? भला मृत्यु के अलावा और क्या चीज़ होगी जो हमें एक दूसरे से अलग कर सकती है?"
ये मेरे किशोरावस्था की बातें है। तब हम सबकुछ को ऐसा समझते है जैसे वो हमेशा रहने वाला हो। उम्र बढ़ने के साथ हम जानते है कि मृत्यु से पहले ही हम सबकुछ से बिछड़ जाएंगे। कुछ नहीं बचेगा जिसके सहारे हम मृत्यु के उस पार जाएंगे। हम जाएंगे एकदम अकेले। ठीक वैसे जैसे हम आए थे।
अब हम साथ नहीं। कभी किसी रोज लगता है काश मैं कुछ बदल सकता। लेकिन सच ये है यहाँ पर लिखा हुआ वो वाक्य तक मैं नहीं बदल सकता जो कहता है कि अब हम साथ नहीं
जब मैं तुमसे मिला तबसे मैं खुदको बहुत अलग समझता था। ऐसा लगता था की किसी के नसीब में तुम जैसी लड़की थोड़ी होगी भला। तुम्हारे होने से मैंने नसीब में मानना शुरू किया था। तुम मेरे लिए ईश्वर तक की कुंजी बनती जा रही थी। तुम्हारे जाने के बाद मैं बस एक नास्तिक बन चुका हूँ। जो केवल एक चीज़ पर विश्वास करता है — जो तुमने बड़े अंतिम में कही थी — Nothing last forever.
—praphull
















