पुराने हिसाब
महकने की बात चली तो उन गुलाबों की याद आई दर्द की बात चली तो उन काँटों की याद आई मुझे न ग़ुलाब चाहिए न काटें पर उपर वाले ने पुराने हिसाब के पर्चे हमेशा हैं बाटें
कर्म की गति कभी नहीं रूकती बंद कमरों में बैठने पर भी सांसे है चलती सांस लेने और छोड़ने में ही कर्म का बंधन लग जाता है लगता है इसकी कोई और तरकीब है जो बंधन छुड़ाता है
जो खुद को बड़ा माने वह बंधता जाता है जो स्वयं को कुछ न समझे वह छूटता जाता है और जब श्रीहरि का साथ मिल जाए तो फिर वह तर जाता है
~ राहुल सिंह

















