कबीर साहेब जी कहते हैं कि,
जीवित बाप के लठ्ठम लठ्ठा, मूए गंग पहुचईयां । जब आवे आसोज का महीना, कौआ बाप बनईया ||
अर्थात जीवित बाप की सेवा ना करके वाद विवाद करते हो, और मरने के बाद कौए को बाप समझ कर श्राद्ध की खीर खिलाते हो। धिक्कार है। इन सबका कारण है पूर्ण संत के सत्संग का अभाव।









