कभी–कभी दुनिया के दिखावे के लिए अभिभावक अपने बच्चों के जीवन का एक बहुत खूबसूरत हिस्सा यानि की बचपन को त्याग देने पर मजबूर हो जाते है.कई बार अभिभावक के रुप में अपने बच्चे को आगे बढ़ता हुआ देखने और समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान की दृष्टि से देखे जाने के लिए माता-पिता अपने बच्चों पर अच्छे अंको से उत्तीर्ण होने का दबाव बनाने लगते हैं नतीजतन भयावह परिणाम देखने को मिलते हैं जैसे की बच्चे डिप्रेशन में चले जाते हैं और तुलना के कारण उनके मन में हीन भावनाए जन्म लेने लगती हैं कभी-कभी यह समस्या बच्चो को हत्या और आत्महत्या जैसे संगीन जुर्म की तरफ धकेल देता है.
हम एक गायक से यह नहीं कह सकते कि अच्छी बैटिंग कर भारत को विश्व कप दिलाए या एक क्रिकेटर से यह नहीं कह सकते की अच्छा गाना गा कर वह ऑस्कर जीत ले। उसी प्रकार हर बच्चे की अपनी एक अलग योग्यता होती है जिसे अंको और शैक्षणिक प्रतिभा के स्तर पर नहीं आंकना चाहिए। कमन अंक आने के बाद भी बच्चों का आत्म-विश्वास बढ़ाना चाहिए और उन्हें मानसिक तौर पर स्थिर रखने की कोशिश करनी चाहिए। आज के समय में बच्चे पहले ही बहुत सारी मुश्किलों का सामना कर पढाई करते हैं और साथ ही वह पहले ही अपने अंको और भविष्य को ले कर चिंतित होते हैं ऐसे में उन्हें ऐसा महसूस करना कि वो कमतर हैं यह उनके मानसिक और शारीरिक दोनों विकास पर गहरा असर डाल सकता है।
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