जिनके बचपन तंगी में गुजरे होते हैं
उन्हें हिसाब रखने की आदत सी लग जाती है।
जैसे हिसाब नही रखा और अगली दोपहर का खाना कैसे आएगा...
पता नहीं।
यही हिसाब रखने की आदत आपके दिलो-दिमाग के साथ ऐसे घुल मिल जाती है कि...
जैसे कुदरती रूप से ये आपका स्वभाव बन गया हो।
अब जब आपकी अपने घर गृहस्थी संभालने की बारी आती...
आपको यही लगता है की हिसाब रखना एक ज़िम्मेदार व्यक्ति की निशानी है।
पर आपकी आंखें खुलने का एक समय आता है...
वो समय जिस दिन 'हिसाब रखने की पट्टी' आपकी आंखों से
झट से उतार ली जाती हैं।
जब आपकी ग्रहणी कहती है कि...
"हमारे बीच 'हिसाब' नहीं, साझेदारी होनी चाहिए।"
कि तेरा मेरा कुछ नहीं होता।
एक-एक पाई गिनना ज़रूरी नहीं होता।
आधा तू करे फिर आधा मैं करू...
ऐसे नहीं निभता।
बल्कि मैं अपनी तरफ़ से पूरा करूं और तू अपनी तरफ़ से पूरा करे...
ऐसे निभता है असली 'हिसाब'।














