कुमार विजय गुप्त
"हर तरफ कीचड़-ही-कीचड़, हर जगह जमी है काई जरा संभल के, बड़ा ही फिसलन भरा समय है भाई
अलबत्ता अपने ही मज़े हैं ऐसी फिसलनों के लिहाजा इन फिसलनों को बार बार दुहराया जा रहा है इन फिसलनों के लुत्फ़ उठाए जा रहे हैं इन फिसलनों पर इतराया जा रहे हैं बिना किसी शर्मिंदगी के बग़ैर किसी खेद के
इन दिनों फिसलने में तज़ुर्बे तोले जा रहे हैं फिसलने में उम्मीद ढूंढ़ी जा रही है फिसलने पर बाग-बाग हुआ जा रहा है कि फिसलने को, मंज़िल तक पहुँचने का सब से क़ामयाब रास्ता माना जा रहा है
बड़ा ही फिसलन भरा समय है भाई कि लाख आगाह किए जाने के बावजूद लोग बारबार फिसल रहे हैं लोग गिर रहे हैं गंदले हो रहे हैं और फिर खीसें निपोरते हर बार यही कह रहे हैं कि दाग़ अच्छे हैं“













