एक बून्द .!!
कभी आईने सी बिलखती हूँ .. कभी तरंगों सी उलझती हूँ .. खुशियों की उमंग सी हूँ मैं , खुशियों से ही डरती हूँ .. हर वक़्त काँटों सा ज़ख़्मी पर्दा है और उस वक़्त से तन्हा मैं बरसती हूँ .. मैं तुम्हारी नहीं , मैं नदियों की , मैं पहाड़ों की , मैं इंसानो की , औज़ारों की , मैं झरनो की , मैं स्याही की , बादल के गुलिस्तानों की तुझसे निकली हूँ नदियों से मिलने लौटूंगी फिर तुझी में मिलने ..
वशिष्ठ २४ सितम्बर २०१८











