दीवाली
निकला घर से सोच के ये कि,आज न लौटूँ खाली, रोज भले ही दो रोटी मिलती,आज मिले एक थाली, सुनता तो हुँ रोज मगर, आज न दे कोई ग़ाली, अरमानों से सजी हुई,आई है आज दीवाली।
दिन भर यूँ ही रहा भटकता,बनके एक सबाली, जगमग होगी रात आज की,या फिर होगी काली, खाली हाथ जो लौटा तो, क्या सोचेगी घरवाली, भूखे पेट भला कैसे फिर,मनेगी आज दीवाली।
नाच रहा है जग आज तो,गा रहा कौबाली, चहक रहे हैं पक्षीगण,झूम रही पत्ती-पत्ती डाली डाली। पर…
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